SUBHASH CHANDRA BOSE JAYANTI: जानिए 23 जनवरी से जुड़ी हस्ती व स्वतंत्रता सेनानी नेता जी के बारे में क्या है खास?

23 जनवरी, नेता जी सुभाषचंद्र बोस जयंती अथवा पराक्रम दिवस


नेता जी सुभाष चंद्र बोस जी का जन्म 23 जनवरी सन् 1897 में उडीसा (ओडिशा) के कटक शहर में हुआ थाI वे कायस्थ जाति के वकील जानकीनाथ बोस के छठे बेटे थे। उन्होंने 1913 में कटक से मैट्रिक पास किया और कोलकाता (तब कलकत्ता) में प्रेसीडेंसी कॉलेज में प्रवेश लिया। इन्होंने ने बीए (आनर्स) की भी पढाई पूर्ण की थी I इनके राजनीतिक गुरु ‘चितरंजन दास’ जी थे तथा स्वामी विवेकानंद जी को अपना आध्यात्मिक गुरु मानते थे I1939 में पहली बार कांग्रेस के अध्यक्ष बने! इन्होंने कई स्वतंत्रता सेनानी पार्टियों का नेतृत्व भी कियाI 1930 के नमक सत्याग्रह आन्दोलन में भी भाग लिए! यह एक सच्चे देशभक्त के साथ-साथ राजनीतिक पार्टी के नेता भी थे I
इनके पारिवारिक जीवन की बात करें तो इनके एक भाई भी थे जिनका नाम शरतचंद्र बोस था और एक भतीजा भी था , इनका विवाह भी हुआ था जिसका लोगों को बाद में पता चला जिससे इनके एक संतान भी प्राप्त हुए! 
सुभाष चंद्र बोस एक सम्मानित भारतीय राजनीतिज्ञ और एक वीर स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्हें प्यार से नेताजी कहा जाता था और उन्हें स्वतंत्रता संग्राम में 11 बार गिरफ्तार किया गया था और ताइपे के ऊपर एक हवाई दुर्घटना में रहस्यमय परिस्थितियों में 18 अगस्त 1945 को उनकी मृत्यु हो गई थी! स्वामी विवेकानंद और रामकृष्ण परमहंस की शिक्षाओं से 15 साल की छोटी उम्र में बोस जी के मस्तिष्क में आध्यात्मिक जागृति पैदा हुई!

” तुम मुझे खून दो, और मैं तुम्हें आजादी दूंगा “- नेताजी सुभाष चंद्र बोस के इस उद्धरण ने हजारों भारतीय युवाओं को ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन से आजादी के संघर्ष में शामिल होने के लिए प्रेरित किया। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में एक महत्वपूर्ण व्यक्ति, नेताजी को कई लोगों द्वारा माना जाता है। अब तक के सबसे महान नेताओं में से एक के रूप में। स्वतंत्रता के लिए भारत के संघर्ष में उनके योगदान को मनाने के लिए, हर साल 23 जनवरी को सुभाष चंद्र बोस का जन्मदिन देश के विभिन्न हिस्सों में मनाया जाता है।
नेताजी के द्वारा दिया गया “जय हिंद” का नारा भारत देश का राष्ट्रीय नारा बन गया हैI जुलाई 1943 में “दिल्ली चलो” का नारा सुप्रीम कमांडर के रूप में सेना को संबोधित करते हुए दिया I
सिंगापुर में सुभाषचंद्र बोस जी का मिशन व जापान में आजाद हिंद फौज का गठन 

भारतीय राष्ट्रीय सेना सुभाष चंद्र बोस रास बिहारी बोस के निमंत्रण पर 2 जुलाई, 1943 को सिंगापुर पहुंचे। उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता लीग के अध्यक्ष के रूप में कार्यभार संभाला और पूर्वी एशिया के नेता के रूप में कार्यभार संभाला। 1943 में ही जापान की मदद से आज़ाद हिन्द फौज का गठन किया और 23 अक्टूबर 1943 को, जापानी सेना की मदद से, नेताजी ने संयुक्त राज्य अमेरिका और ब्रिटेन के खिलाफ युद्ध की घोषणा की।  
जापानियों ने उन्हें आजाद हिंद फौज को फिर से संगठित करने और फिर से जीवंत करने में मदद की, जिसे द इंडियन नेशनल आर्मी (आईएनए) भी कहा जाता है। उन्होंने आजाद हिंद फौज के लिए सक्रिय भर्ती शुरू की और दक्षिण पूर्व एशिया में आक्रामक रूप से धन की पुष्टि की। बोस ने सफलतापूर्वक कई ब्रिटिश भारतीय सैनिकों की भर्ती की और अप्रैल 1944 में भारत में अंग्रेजों के खिलाफ एक आक्रामक सेना का नेतृत्व किया। अंग्रेजों से भारतीय भूमि को पुनः प्राप्त करने के प्रतीक के रूप में, उन्होंने बर्मी सीमा पार करने के बाद मिजोरम में राष्ट्रीय तिरंगा लगाया। हालांकि, सेना कोहिमा और इंफाल पर कब्जा करने में विफल रही और सेना बर्मा से पीछे हट गई। इस युद्ध घोषणा को विफल माना गया, और बोस 24 अप्रैल, 1944 को सिंगापुर वापस चले गए। द मिस्टीरियस डेथ: प्लेन क्रैश, एविडेंस की कमी सिंगापुर में रहते हुए, बोस को 1945 में जापानी आत्मसमर्पण के बारे में सुनने के बाद एक महत्वपूर्ण झटका लगा।  
17 अगस्त 1945, वह बैंकॉक जाने के लिए सिंगापुर से रवाना हुए और एक जापानी बमवर्षक द्वारा उन्हें विमान में बैठने की पेशकश की गई। जापानियों ने सोवियत संघ के साथ अपनी बैठक के लिए उन्हें हर संभव सुविधाएं देने का वादा किया था, जहां उन्हें राष्ट्रवादी आंदोलन के लिए कुछ समर्थन मिलने की उम्मीद थी। हालांकि, विमान ताइपे हवाईअड्डे के आसपास दुर्घटनाग्रस्त हो गया और कहा जाता है कि बोस का शरीर सिर से पांव तक जल गया था। चूंकि उसका शरीर पूरी तरह से जल चुका था, इसलिए उसकी पहचान की पुष्टि नहीं हो सकी। हालांकि, कुछ राख को टोक्यो लाया गया और रेंकोजी मंदिर में रखा गया, जहां उन्होंने विश्राम किया।
 भारत की आजादी के 75 वर्ष पूर्ण होने पर माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने 2018 में पूरे इतिहास में पहली बार लाल किले पर तिरंगा झंडा फहराया I पिछले साल 23 जनवरी 2021 को सुभाषचंद्र बोस जी की 124 वीं जयंती मनाई गई जिसे प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने पराक्रम दिवस के रूप में मनाने की घोषणा कीI अत: हर वर्ष 23 जनवरी को पराक्रम दिवस के रूप में भी मनाया जाता है! इस बार भी नेता जी सुभाषचंद्र जी का जन्म दिवस पराक्रम दिवस के रूप में पूरे भारत 125 जयंती के रूप में मनाया जा रहा है I माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी आज नयी दिल्ली में इनकी प्रतिमा का अनावरण करेंगे! 

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